​राज कुमारचे 'हे' आहेत प्रसिद्ध डायलॉग, जे ऐकून आजही येतात अंगावर शहारे !

राज कुमार जरी आज आपल्यात नाहीत पण त्यांचे डायलॉग आजही लोकांच्या मनावर अधिराज्य गाजवत आहेत. पाहूया, त्यांचे डायलॉग...!

​राज कुमारचे 'हे' आहेत प्रसिद्ध डायलॉग, जे ऐकून आजही येतात अंगावर शहारे !
Published: 11 Aug 2017 06:07 PM  Updated: 11 Aug 2017 06:15 PM

-रवींद्र मोरे 
राज कुमार जरी आज आपल्यात नाहीत पण त्यांचे डायलॉग आजही लोकांच्या मनावर अधिराज्य गाजवत आहेत. चित्रपटातील त्यांचे डायलॉग ऐकून आजही अंगावर शहारे आल्याशिवाय राहत नाहीत. राज कुमार मुंबई येथे पोलीस सब-इन्स्पेक्टर होते. १९५२ ते १९९५ दरम्यानच्या या ४२ वर्षाच्या चित्रपटसृष्टीतील करिअरमध्ये त्यांनी पोलिस अधिकारी, आर्मी आॅफिसर, ठाकूर आदी वेगवेगळ्या भूमिका साकारुन अभिनय क्षेत्रात वेगळा ठसा उमटविला आहे. चित्रपटात आपले विरोधक आणि विलन्सवर असे डायलॉग मारायचे की, समोरचा ते ऐकूनच गारद व्हायचा. त्यांच्या या डायलॉगने मात्र प्रेक्षकांचे खूपच मनोरंजन व्हायचे.  
८ आॅक्टोंबर १९२६ रोजी बलूचिस्तान मध्ये जन्मलेल्या राज कुमारचा मृत्यू ३ जुलै १९८६ रोजी गळ्याच्या कॅन्सरच्या कारणाने झाला. 
त्यांची आठवण त्यांच्या या डायलॉग्समुळे आपल्या स्मरणात नेहमी राहिल... 

पाहूया, त्यांचे डायलॉग...!

‘जब राजेश्वर दोस्ती निभाता है तो अफसाने लिक्खे जाते हैं..
और जब दुश्मनी करता है तो तारीख बन जाती है!’
-राजेश्वर सिंह, सौदागर (1991)

‘जिसके दालान में चंदन का ताड़ होगा वहां तो सांपों का आना-जाना लगा ही रहेगा!’
-पृथ्वीराज, बेताज बादशाह (1994)

‘चिनॉय सेठ, जिनके अपने घर शीशे के हों, वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते!’
-राजा, वक्त (1965)



‘बेशक मुझसे गलती हुई. मैं भूल ही गया था, इस घर के इंसानों को हर सांस के बाद दूसरी सांस के लिए भी आपसे इजाजत लेना पड़ती है. और आपकी औलाद खुदा की बनाई हुई जमीन पर नहीं चलती, आपकी हथेली पर रेंगती है!’
-सलीम अहमद खान, पाकीजा (1972)

‘जब खून टपकता है तो जम जाता है, अपना निशान छोड़ जाता है, और चीख-चीखकर पुकारता है कि मेरा इंतकाम लो, मेरा इंतकाम लो!’
-जेलर राणा प्रताप सिंह, इंसानियत का देवता (1993)

‘बिल्ली के दांत गिरे नहीं और चला शेर के मुंह में हाथ डालने. ये बद्तमीज हरकतें अपने बाप के सामने घर के आंगन में करना, सड़कों पर नहीं!’
-प्रोफेसर सतीश खुराना, बुलंदी (1980)

‘हम अपने कदमों की आहट से हवा का रुख बदल देते हैं!’
-पृथ्वीराज, बेताज बादशाह (1994)

‘जानी.. हम तुम्हे मारेंगे, और जरूर मारेंगे.. लेकिन वो बंदूक भी हमारी होगी,
गोली भी हमारी होगी और वक़्त भी हमारा होगा!’
-राजेश्वर सिंह, सौदागर (1991)

‘महा सिंह, शायद तुम अंजाम पढ़ना भूल गए हो. लेकिन ये याद रहे कि इंसाफ के जिन सौदागरों के भरम पर, तुम फर्ज़ का सौदा कर रहे हो, उनकी गर्दनें भी हमारे हाथों से दूर नहीं!’
-जगमोहन आजाद, पुलिस पब्लिक (1990)

‘हम वो कलेक्टर नहीं जिनका फूंक मारकर तबादला किया जा सकता है. कलेक्टरी तो हम शौक से करते हैं, रोजी-रोटी के लिए नहीं. दिल्ली तक बात मशहूर है कि राजपाल चौहान के हाथ में तंबाकू का पाइप और जेब में इस्तीफा रहता है. जिस रोज इस कुर्सी पर बैठकर हम इंसाफ नहीं कर सकेंगे, उस रोज हम इस कुर्सी को छोड़ देंगे. समझ गए चौधरी!’
-राजपाल चौहान, सूर्या (1989)

‘याद रखो, जब विचार का दीप बुझ जाता है तो आचार अंधा हो जाता है और हम अंधेरा फैलाने नहीं अंधेरा मिटाने आए हैं!’
-साहब बहादुर राठौड़, गॉड एंड गन (1995)

‘हम कुत्तों से बात नहीं करते!’
-राणा, मरते दम तक (1987)

‘हम तुम्हे वो मौत देंगे जो ना तो किसी कानून की किताब में लिखी होगी और ना ही कभी किसी मुजरिम ने सोची होगी!’
-ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह, तिरंगा (1992)

‘अगर सांप काटते ही पलट जाए, तो उसके जहर का असर होता है वरना नहीं. हम सांप को काटने की इजाजत तो दे सकते हैं लेकिन पलटने की इजाजत नहीं देते परशुराम!’
-पृथ्वीराज, बेताज बादशाह (1994)

‘राजा के गम को किराए के रोने वालों की जरूरत नहीं पड़ेगी चिनॉय साहबछ!’
-राजा, वक्त (1965)

‘घर का पालतू कुत्ता भी जब कुर्सी पर बैठ जाता है तो उसे उठा दिया जाता है. इसलिए क्योंकि कुर्सी उसके बैठने की जगह नहीं. सत्य सिंह की भी यही मिसाल है. आप साहेबान जरा इंतजार कीजिए!’
-साहब बहादुर राठौड़, गॉड एंड गन (1995)

‘शेर को सांप और बिच्छू काटा नहीं करते..
दूर ही दूर से रेंगते हुए निकल जाते हैं!’
-राजेश्वर सिंह, सौदागर (1991)

‘इस दुनिया में तुम पहले और आखिरी बदनसीब कमीने होगे, जिसकी ना तो अर्थी उठेगी और ना किसी कंधे का सहारा. सीधे चिता जलेगी!’
-राणा, मरते दम तक (1987)

‘और फिर तुमने सुना होगा तेजा कि जब सिर पर
बुरे दिन मंडराते हैं तो जबान लंबी हो जाती है!’
-प्रोफेसर सतीश खुराना, बुलंदी (1980)

‘अपना तो उसूल है. पहले मुलाकात, फिर बात, और फिर अगर जरूरत पड़े तो लात!’
-ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह, तिरंगा (1992)

‘भवानी सिंह को बुजदिल कोई कह नहीं सकता! आत्मा बह नहीं गई चंदन, आत्मा लौट आई है. और अब ऐसे मालूम होता है कि बुजदिल हम पहले थे. बुजदिली का वो चोला आज उतारकर हमने फेंक डाला. ये कौन सी बहादुरी है कि दिन के उजाले में निकले तो भेस बदल कर, सोओ तो बंदूकों का तकिया बनाकर. चंदन, न घर ना बार, हवा का एक मामूली सा झोंका, चौंका देता है और घबराकर ऐसे उठ बैठते हैं जैसे पुलिस की गोली थी. इन गुमराह खंडरों को छोड़कर, चल मेरे साथ, इंसानों की बस्ती में चंदन, चल!’
-ठाकुर भवानी सिंह, धरम कांटा (1982)

‘चलो यहां से ये किसी दलदल पर कोहरे से बनी हुई हवेली है जो किसी को पनाह नहीं दे सकती. ये बड़ी खतरनाक जगह है!’
-सलीम अहमद खान, पाकीजा (1972)

‘ताकत पर तमीज की लगाम जरूरी है. लेकिन इतनी नहीं कि बुजदिली बन जाए!’
-राजेश्वर सिंह, सौदागर (1991)

‘बोटियां नोचने वाला गीदड़, गला फाड़ने से शेर नहीं बन जाता!’
-राणा, मरते दम तक (1987)

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‘हम आंखों से सुरमा नहीं चुराते, हम आंखें ही चुरा लेते हैं!’
-ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह, तिरंगा (1992)

‘हमने देखें हैं बहुत दुश्मनी करने वाले, वक्त की हर सांस से डरने वाले. जिसका हरम-ए-खुदा,
कौन उसे मार सके, हम नहीं बम और बारूद से मरने वाले!’
-साहब बहादुर राठौड़, गॉड एंड गन (1995)

‘जानी, ये बच्चों के खेलने की चीज नहीं,
हाथ कट जाए तो खून निकल आता है!’
-राजा, वक्त (1965)

‘इरादा पैदा करो, इरादा. इरादे से आसमान का चांद भी
इंसान के कदमों में सजदा करता है!’
-प्रोफेसर सतीश खुराना, बुलंदी (1980)

‘कौवा ऊंचाई पर बैठने से कबूतर नहीं बन जाता मिनिस्टर साहब! ये क्या हैं और क्या नहीं हैं ये तो वक्त ही दिखलाएगा!’
-जगमोहन आजाद, पुलिस पब्लिक (1990)

‘ये तो शेर की गुफा है. यहां पर अगर तुमने करवट भी ली
तो समझो मौत को बुलावा दिया!’
-राणा, मरते दम तक (1987)



‘तुमने शायद वो कहावत नहीं सुनी महाकाल, कि जो दूसरों के लिए खड्डा खोदता है वो खुद ही उसमें गिरता है. और आज तक कभी नहीं सुना गया कि चूहों ने मिलकर शेर का शिकार किया हो. तुम हमारे सामने पहले भी चूहे थे और आज भी चूहे हो. चाहे वो कोर्ट का मैदान हो या मौत का जाल, जीत का टीका हमारे माथे ही लगा है हमेशा महाकाल. तुमने तो सिर्फ मौत के खड्डे खोदे हैं, जरा नजरें उठाओ और ऊपर देखो, हमने तुम्हारे लिए मौत के फरिश्ते बुला रखे हैं. जो तुम्हे उठाकर इन मौत के खड्डों में डाल देंगे और दफना देंगे!’
-कृष्ण प्रसाद, जंग बाज (1989)

‘ना तलवार की धार से, ना गोलियों की बौछार से.. बंदा डरता है तो सिर्फ परवर दिगार से!’
-ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह, तिरंगा (1992)

‘काश तुमने हमें आवाज दी होती.. तो हम मौत की नींद से उठकर चले आते!’
-राजेश्वर सिंह, सौदागर (1991)

‘महा सिंह, शेर की खाल पहनकर आज तक कोई आदमी शेर नहीं बन सका!’
और बहुत ही जल्द हम तुम्हारी ये शेर की खाल उतरवा लेंगे.
-जगमोहन आजाद, पुलिस पब्लिक (1990)

‘दादा तो दुनिया में सिर्फ दो हैं. एक ऊपर वाला और दूसरे हम!’
-राणा, मरते दम तक (1987)


पद्मावती चित्रपटाला होत असलेला विरोध योग्य आहे असे तुम्हाला वाटते का?

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